बडी़ जालिम है ये वक्त की सियासत

मुझे शक था उस शख्स पर,
कि अपनी जुबां पर न टिक पायेगा, 
जो आज कह रहा है ,कल मुकर जायेगा, 
हमें भी आदत नहीं किसी की खुशामद की, 
जिन्हें आना है आये, जाने वाला खुद निकल जायेगा, 
कसक नहीं है मुझे जरा भी किसी के आने-जाने की, 
हाँ, कुछ अश्क आँखों से जरूर बिखर जायेगा, 
बडी़ जालिम है ये वक्त की सियासत, 
न जाने किस मोड़ पर तू शरण चाहेंगा, 
हम हुनर जानते हैं, गमों से मोहब्बत का, 
बेखौफ आना तू जरूर रहम पायेगा। 

भूख ने इसकी इजाजत न दी...

ढ़िबरी के उजाले में,
उसने अपनी गरीबी रोशन की थी, 
खुद ठिठुर रहीं थी ठण्ड से, 
गर्म कपड़ो की दुकान सजाकर, 
कोई सपने न थे आँखों में, 
भूख ने इसकी इजाजत न दी, 
उसके बच्चे भी स्कूल जाये, 
नये- नये बैग व ड्रेस पाये, 
ये बस सपने ही रह गए, 
आज भी कूड़े के ढेर में, 
अपने भविष्य तलाशते मिलतें है, 
सियासत ने हर बार वादा किया, 
रियासत मिलतें ही सूरत बदल देगें, 
हर बार धोखा हुआ, 
हर बार धोखा हुआ। 


एक शाम ...

दिन ढल रहा था, 
शाम हो रही थी, 
बाजार की ओर, 
मैं भी बढ़ रहा था, 
हर ओर चकाचौंध थी, 
वस्तुओं के साथ इसकी भी, 
कीमत खरीदार भर रहा था, 
हर कोई अपने अंदाज में यहाँ, 
व्यापार कर रहा था, 
दौलत की जोर से एक सेठ, 
मजदूर के पसीने से, 
आरामकुर्सी पर बैठकर, 
अपनी तिजोरी भर रहा था, 
फुटपाथ पर बैठे एक दुकानदार के,      
माथे पर, आज के भोजन की चिंता, 
साफ-साफ झलक रहा था। 

हमारा अभियान जारी है...

मुस्कुराहट शब्दों को छुपा लेतीं है,
मगर कुछ बात इशारों में बता देती है, 
अभी -अभी उस गली से गुजरा हूँ, 
मैंने देखा कि उसकी सिसकियाँ, 
फौलाद को भी  गला देती है, 
मैंनें चाहा झाक लूँ उसको झरोखों से, 
हर बार पर्दें से खुद को छुपा लेती हैं, 
तुम्हें याद है जब हम बिल्कुल करीब थें, 
हाँ, सही है कि हम कभी मिले ही नहीं, 
मगर फिर भी हम रोज मिलतें थे, 
अपने अपने सपनों के साथ, 
सपने भी तो एक ही थें, 
तुमने उड़ान भर ली, 
हम फड़ - फड़ाते रह गए, 
पहुँची तो तुम भी नहीं , मंजिल पर
हाँ, साया जरूर पा लिया तुमने, 
टूटे नहीं है हम भी अभी, 
समंदर में तूफान जारी है, 
हमारा अभियान जारी है। 

अंधियारे में उजियारा भर दो...



वीर सपूतों के वंशज हैं, 
धीर सदा हम धरते हैं, 
रण में भर दे हुंकार यदि, 
पर्वत भी  थर-थर करते हैं। 
कोना-कोना इस धरती का, 
हमने सदियों से सजाया  था, 
ज्ञान, विज्ञान और कला का, 
अलौकिक ज्योति जलाया था , 
मानव के उत्कर्ष स्वरूप से, 
परिचय हमने करवाया था, 
वेद, पुराण, योग व दर्शन
समस्त विश्व में फैलाया था, 
सच है कि सहस्त्र वर्षों तक, 
आक्रान्ताओं का साया था,
तलवार-तोप के बल पे, 
भय का बादल छाया था, 
अब समय ने करवट बदली है, 
संयमित रहो, संगठित रहो, 
औरों में न भ्रमित रहो, 
हर नुक्कड़ पर दीपक धर दो, 
अंधियारे में उजियारा भर दो।